अंतरिक्ष में भारत को एक और मिली बड़ी कामयाबी

 

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श्रीहरिकोटा। भारतीय अंतरिक्ष
अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कामयाबी
के एक और मील का पत्थर स्थापित
करते हुए देश के पहले एस्ट्रोसैट
उपग्रह पीएसएलवी-सी30 का प्रक्षेपण
कर इतिहास रच दिया।
यह भारत का पहला एस्ट्रोसैट
उपग्रह है और इससे ब्रहांड को समझने
और सुदूरवर्ती खगोलीय ङ्क्षपडों के
अध्ययन करने में में मदद मिलेगी।
513 किलोग्राम का एस्ट्रोसैट उपग्रह
को छह अन्य विदेशी उपग्रहों के साथ
प्रक्षेपित किया गया।
इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और
अंतरिक्ष में भारत को एक और मिली बड़ी कामयाबी
इसके अध्यक्ष ए.एस किरण कुमार की
निगरानी में इस ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण
यान (पीएसएलवी) को
श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया
गया।
एस्टोसैट ब्रह्मांड के बार में
जानकारियां जुटाने में मदद
करेगा। इसका उपयोग ब्लैक
होल के अध्ययन के अलावा तारों
और आकाशगंगाओं के जन्म और
उनके खत्म होने के कारणों का
विश्लेषण करने के लिए भी किया
जाएगा। एस्ट्रोसैट के 5 साल के
मिशन पर भेजा गया है। एस्ट्रोसैट का
उपकरण तैयारी करने वाली संस्थाओं
में से एक अंतर विश्वविद्यालय खगोल
विज्ञान व खगोल भौतिकी ने कहा है
कि भले ही यह अपनी तरह का विश्व
का पहला उपग्रह नहीं है मगर अब
तक का यह सर्वश्रेष्ठ खगोलीय
उपग्रह है। यह हैं छह विदेशी
उपग्रह
इंडोनेशिया का 76 किलो
वजनी एलएपीएन-ए2 उपग्रह
नेशनल इंस्टीट्यूट
ऑफएयरोनॉटिक्स एंड स्पेस
द्वारा विकसित एक
माइक्रो-उपग्रह है। यह
ऑटोमिटिक आइडेटिफिकेशन
सिस्टम (एआईएस) द्वारा समुद्र
की निगरानी करेगा।
कनाडा का 14 किलो वजनी
एनएललएस-14(ईवी9) उपग्रह
यूनिवर्सिटी ऑफटोरंटो के इंस्टीट्यूट
फॉर एडवांउड स्टडीज के स्पेस लाइट
लेबोरेट्री द्वारा विकसित किया गया है।
यह भी समुद्र की निगरानी करने वाला
उपग्रह है।
बाकी के चार एलईअमयूआर नैनो
उपग्रह अमरीका के सैन फ्रांसिस्को
आधारित कंपनी के स्पायर ग्लोबल
आईएनसी द्वारा विकसित किया गया
है। ये नॉन-विजुअल रिमोट रोसिंग
उपग्रह हैं, जो ग्लोबल मेरिटाइट
इंटेलिलेंस पर केंद्रित हैं।