करेला डायबिटीज जैसे कई रोगों को दूर करे

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Karela P-5

लेटिन में मोर्डिका तथा अंग्रेजी में
बिटर गॉर्ड के नाम से पुकारा जाने
वाला करेला बेल पर लगने वाली
सब्जी है। इसका रंग हरा होता है
इसकी सतह पर उभरे हुए दाने होते
हैं। इसके अंदर बीज होते हैं। यह
अपने स्वाद के कारण काफी प्रसिद्ध
है। इसका स्वाद बहुत कडुवा होता है
इसलिए प्रायः कडुवे (बुरे) स्वभाव वाले
व्यक्ति की तुलना करेले से कर दी
जाती है।एक अच्छी सब्जी होने के
साथघ्साथ करेले में दिव्य औषधीय
गुण भी होते हैं। यह दो प्रकार का
होता है बड़ा तथा छोटा करेला। बड़ा
करेला गर्मियों के मौसम में पैदा होता
है जबकि छोटा करेला बरसात के
मौसम में। चूंकि इसका स्वाद बहुत
कडुवा होता है इसलिए अधिकांश लोग
इसकी सब्जी को पसंद नहीं करते।
इसके कड़वेपन को दूर करने के लिए
इसे नमक लगाकर कुछ समय तक
रखा जाता है।
करेले की तासीर ठंडी होती है।
यह पचने में हल्का होता है। यह
शरीर में वायु को बढ़ाकर पाचन क्रिया
को प्रदीप्त कर, पेट साफ करता है।
करेला डायबिटीज जैसे कई रोगों को दूर
प्रति 100 ग्राम करेले में लगभग 92
ग्राम नमी होती है। साथ ही इसमें
लगभग 4 ग्राम कार्बाेहाइट्रेट, 1.5 ग्राम
प्रोटीन, 20 मिलीग्राम कैल्शियम, 70
मिलीग्राम फास्फोरस, 1.8 मिलीग्राम
आयरन तथा बहुत थोड़ी मात्रा में वसा
भी होता है। इसमें विटामिन ए तथा
विटामिन सी भी होता है जिनकी मात्रा
प्रति 100 ग्राम में क्रमशः 126 मिलीग्राम
तथा 88 मिलीग्राम होती है। नमी अधिक
तथा वसा कम मात्रा में होने के कारण
यह गर्मियों के लिए बहुत अच्छा है।
इसके प्रयोग से त्वचा साफ होती है
और किसी प्रकार के फोड़े-फुन्सी नहीं
होते। यह भूख बढ़ाता है, मल को
शरीर से बाहर निकालता है। मूत्र मार्ग
को भी यह साफ रखता है। इसमें
विटामिन ए अधिक होने के कारण यह
आखों की रोशनी के लिए बहुत अच्छा
होता है। रतौंधी होने पर इसके पत्तों के
रस का लेप थोड़ीघ्सी काली मिर्च
मिलाकर लगाना चाहिए। इस रोग के
कारण रोगी को रात में कुछ भी दिखाई
नहीं पड़ता। विटामिन सी की अधिकता
के कारण यह शरीर में नमी बनाए
रखता है और बुखार होने की स्थित में
बहुत लाभकारी होता है। करेले की
सब्जी खाने से कभी कब्ज नहीं होती
यदि किसी व्यक्ति को पहले से कब्ज
हो तो वह भी दूर ही जाती है। इससे
एसीडिटी, छाती में जलन और खट्टी
डकारों की शिकायत भी दूर हो जाती
है। बढ़े हुए यकृत, प्लीहा तथा मलेरिया
बुखार में यह बहुत फायदेमंद सिद्ध
होता है। इसके लिए रोगी को करेले
के पत्तों या कच्चे करेले को पीसकर
पानी में मिलाकर पिलाया जाता है।
यह इस दिन में कम से कम तीन बार
पिलाना चाहिए। कच्चा करेला पीसकर
पिलाने से पीलिया भी ठीक हो जाता
है। रस निकालने से पहले पत्तों या
करेले को ठीक से रगड़कर धोना जरूरी
होता है क्योंकि आजकल फल सब्जियों
को रोगों तथा कीड़ों से बचाने के लिए
अनेक रसायन छिड़के जाते हैं जो
हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते
हैं।जोड़ों के दर्द तथा गठिया रोग में
करेले की सब्जी बिना कडुवापन दूर
किए दिन में तीनों समय अर्थात सुबह
नाश्ते में और फिर दोपहर तथा रात्रि
के भोजन में खाई जानी चाहिए।
फोड़े-फुन्सी तथा रक्त विकार में करेले
का रस लाभकारी होता है।
इन पर करेले के पत्तों का लेप
भी किया जा सकता है। करेले का रस
निकालते समय यह ध्यान रखें कि यह
बहुत ज्यादा पतला न हो और उसे
साफ बर्तन में निकाला जाए।करेले के
रस की एक चम्मच मात्रा में शक्कर
मिलाकर पीने से खूनी बवासीर में
लाभ होता है। यह शरीर में उत्पन्न
टॉकसिन्स तथा उपस्थित अनावश्यक
वसा को दूर करता है अतः यह मोटापा
दूर करने में भी विशेष रूप से सहायक
होता है। जिस स्त्री को मासिक स्राव
बहुत कठिन तथा दर्द भरा हो तो उसे
भी करेले के रस का सेवन करना
चाहिए।

 


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