सच्चे धर्म की शक्ति दिखाई गुरु नानक ने

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सिख पंथ के प्रवर्तक गुरु नानक देव का जन्म 11 नवम्बर, 1469 (कार्तिक
पूर्णिमा वि. सम्वत् 1526) को ग्राम ननकाना, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में काल
मेहता एवं तृप्ता देवी के घर हुआ था। अब यह स्थान पाकिस्तान में है। कहते
हैं कि उनके जन्म के समय कमरे में प्रकाश हो गया और बालक खिल-खिलाकर
हंसा था। यह देखकर ज्योतिषियों ने उन्हें विशेष शक्तियों का स्वामी और अवतारी
कहा।
कुछ बड़े होने पर शिक्षा के लिए वे क्रमशः गोपाल पांधे, पंडित बृजलाल और
फिर फारसी पढ़ने के लिए एक मौलवी के पास गये। यज्ञोपवीत के समय उन्होंने
इसे पहनने से मना कर दिया और कहा कि मैं तो दया की कपास, संतोष का
सूत और प्रभुनाम की गांठों से बना जनेऊ ही पहनूंगा, जो न तो मैला होगा और
न टूटेगा, न जलेगा और न कभी खोएगा।
उनके पिता ने उन्हें भैंस चराने, खेती, दुकानदारी आदि में लगाना चाहा, पर
उनका मन इनमें नहीं लगा। एक बार पिता ने 20 रुपये देकर कोई लाभदायक
सौदा करने भेजा, तो वे साधुओं का राशन खरीदकर दे आये और कहा कि वे
श्सच्चा सौदाश् करके आये हैं। पिता ने नाराज होकर उन्हें बहन नानकी के पास
भेज दिया। बहनोई की सिफारिश पर सुल्तानपुर के नवाब ने उन्हें भंडार का काम
सौंपा, पर वे वहां भी प्रभुभक्ति में डूबे रहते थे। कुछ ईषर्यालु लोगों ने उनकी
शिकायत की, पर जांच करने पर सब हिसाब ठीक मिला। उनका विवाह 18 वर्ष
की अवस्था में मूलचंद खत्री की बेटी सुलक्खिनी के साथ हुआ।
उन दिनों भारत में मुगलों के अत्याचार और अनाचार बढ़ रहे थे। वे इससे
बहुत दुःखी थे। एक बार वे गायब हो गये और तीन दिन बाद फकीरों जैसे कपड़े
पहनकर शमशान में जा बैठे। वे कहते- हिंदू हो या मुसलमान, सब मानव
बराबर हैं। कुछ दिनों बाद पत्नी और दो बच्चों को बहन के पास छोड़कर वे अपने
साथी मरदाना के साथ देश भ्रमण को निकल गये।
उन्होंने गोइन्दवाल, डेरा साहिब, सैदपुर, लाहौर, तलवण्डी, करनाल, पानीपत,
हरिद्वार, दिल्ली, मथुरा, वृंदावन, काशी, पटना, गया गोहाटी, चटगांव, जगन्नाथ
पुरी, कटक, आगरा, सुल्तानपुर, तीरथपुर, स्यालकोट और करतारपुर की यात्रा
की। इसमें उन्होंने सच्चे धर्म की शक्ति का उल्लेख किया। दिल्ली के बादशाह

को समझाकर उन्होंने अनेक साधुओं को जेल से मुक्त कराया। सम्वत् 1565 में
यह यात्रा पूरी कर उन्होंने करतारपुरगांव की नींव रखी।
उन्होंने दूसरी यात्रा दो वर्ष बाद की, जिसमें वे सुल्तानपुर, भटिण्डा,
हनुमानगढ़, बीकानेर, मैसूर आदि स्थानों पर गये। सम्वत् 1573 में हुई तीसरी
यात्रा में वे दक्षिण दिशा में करतारपुर के लिए रवाना हुए। इसमें वह जम्मू-कश्मीर,
गढ़वाल, सुमेरु पर्वत, मानसरोवर आदि दिव्य स्थानों पर गये। चौथी यात्रा उत्तर
दिशा में थी, जिसमें वे तलवण्डी, झेलम, मक्का, मदीना, बगदाद, ईरान,
तुर्किस्तान, काबुल, कंधार, स्यालकोट आदि स्थानों पर गये। उनकी ये यात्राएं
उदासी कहलाती हैं।
समस्त विश्व के मानव मात्र को एक मानने वाले गुरु नानकदेव ने परमपिता
परमात्मा की सत्ता का वर्णन कर आश्विन बदी दशमी, संवत् 1596 (सात
सितम्बर, 1539) को यह देह त्याग दी। उन्होंने अपने सामने ही लहनाजी को
गुरुगद्दी पर बैठाकर उन्हें अंगददेव नाम दिया।

 


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