आदर्शग्राम और अनौपचारिक शिक्षा

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भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी जी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना
का सूत्रपात करके भारत के ग्रामीण
विकास में तीव्रता लाने की दिशा में
महत्त्वपूर्ण पहल की है। आशा करें कि
एक एक माननीय सांसद अपने अपने
विधानमंडल के तीन तीन गांवों को सन
2019 तक आदर्शग्राम के रूप में
विकसित कर पाएंगे। इस प्रकार करीब
आठ सौ सांसदों के नेतृत्व में करीब
2500 गांवों का सर्वांगीण विकास संभव
हो सकेगा। धीरे धीरे इनका समीपस्थ
गांवों पर भी पड़ेगा।
हमारे गांवों के विकास के लिए
सरकार के विविध विभागों ने अब तक
न जाने कितनी योजनाएं बनायीं पर
क्या इन योजनाओं का सत्परिणाम हमारे
ग्रामीणों को पूर्ण रूप से मिल पाया?
यदि नहीं तो उसके लिए कौन जिम्मेदार
है? प्रायः हम सरकारी कर्मचारियों को
तथा जनप्रतिनिधियों को इसके लिए
जिम्मेदार ठहराने का प्रयत्न करते हैं।
कहते हैं कि वे अपना दायित्व पूरी तरह
आदर्शग्राम और
अनौपचारिक शिक्षा
निभाते तो हमारे ग्रामीण क्षेत्रों का अब
तक पूर्ण विकास हो पाता पर जरा
सोचें, क्या इसमें उन ग्रामीणों का भी
दोष नहीं जो उनके लिए बनायी गई
योजनाओं का पूरा पूरा लाभ उठाने के
लिए आगे नहीं आते? हम देखते हैं कि
जो इन योजनाओं के संबंध में आवश्यक
जानकारी प्राप्त करके आगे आते हैं, वे
इन योजनाओं का पूरा पूरा लाभ उठाते
हुए विकास की ओर अग्रसर होते रहे
हैं।जहां जानकारी प्राप्त करने की बात
आती है वहां शिक्षा पर भी विचार करना
पड़ता है। जो अल्पशिक्षित, अशिक्षित
या निरक्षर हैं, वे विकास योजनाओं से
संबंधित पर्याप्त जानकारी कैसे प्राप्त
कर सकते हैं? इन योजनाओं से संबंधित
जो भी मुद्रित सामग्री उपलब्ध है, उसे ये
बेचारे कैसे पढ़ पाएंगे?
स्कूली आयु के बच्चों के लिए
हर गांव में औपचारिक शिक्षा की पर्याप्त
सुविधाएं उपलब्ध कराना आदर्श ग्राम
की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
अपनी मातृभाषा के माध्यम से बारहवीं
कक्षा तक की निःशुल्क शिक्षा पाने का
अवसर हर बालक-बालिका को मिलना
चाहिए। हमारे देश में आज भी ऐसे
अनेकों गांव हैं जहां ऐसी सुविधा उपलब्ध
नहीं है? यदि आज ऐसी सुविधा उपलब्ध
कर सकें तो अगले कुछ वर्षों के अंदर
अंदर हमारा संपूर्ण साक्षर देश बन
सकेगा।पर जब तक यह लक्ष्य सिद्ध
नहीं हो सकेगा, तब तक हमें
अनौपचारिक शिक्षा पर अधिक ध्यान
देना होगा। जो व्यक्ति अठारह वर्ष की
आयु पार कर चुके हैं, उन्हें बारहवीं
कक्षा तक के औपचारिक शिक्षा केंद्रों में
दाखिल नहीं कर सकते। उनके लिए
गांव गांव में अनौपचारिक शिक्षा केंद्र
खोलने ही होंगे।
अनौपचारिक शिक्षा केंद्र में विभिन्न
प्रकार के पाठयक्रम चलाए जा सकते
हैं। शिक्षार्थी की आवश्यकता, रूचि,
सुविधा, क्षमता इत्यादि के आधार पर
विभिन्न प्रकार के पाठयक्रम चलाए जा
सकते हैं। अठारह साल से साठ सत्तर
साल तक के व्यक्ति भी इन पाठयक्रमों
का लाभ उठा सकते हैं। जो औपचारिक
शिक्षा से पूर्णतः वंचित रह गए हैं, उनके
लिए प्रौढ़ साक्षरता के पाठयक्रम चलाए
जा सकते हैं। उनके लिए चौथी, सातवीं,
दसवीं और बारहवीं कक्षा की तुल्यता
परीक्षाएं चला कर उनमें विजय पाने
वालों को उत्तीर्णता का प्रमाण पत्र दे
सकते हैं। इन प्रमाण पत्रों के आधार पर
उन्हें सरकारी/गैर सरकारी संस्थाओं
में नौकरी और पदोन्नति मिल सकेगी।
केरल में इस योजना का सफल प्रयोग
देखने को मिलता है।अनौपचारिक शिक्षा
केंद्रों में कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, कला
आदि से संबंधित स्वकालीन पाठयक्रम
बड़ी सफलता के साथ आयोजित किए
जा सकते हैं। धान की खेती करने वालों
के लिए धान की खेती के संबंध में
सेमिनार, संगोष्ठी और स्वकालीन
पाठ्यक्रम चलाए जा सकते हैं।