धर्म की विडम्बना

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भारत आदिकाल से मंदिरों, मठों,
ऋषियों, मुनियों एवं
सन्त-महात्माओं का देश रहा है ।
यहाँ के ओजस्वी अवतार पुरुषों ने
विश्व भर में अपनी प्रखर
ज्ञान-ज्योति का प्रकाश फैलाया।
योग, ध्यान, आराधना और साधना
के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना
का साक्षात्कार हीं इन महान सन्तों
का उद्देश्य हुआ करता था ।

धर्म का वास्तविक अर्थ आध्यात्मिक
चौतन्यता से साक्षात्कार है । वास्तविक
धर्म ह्रदय का धर्म है, सम्पूर्ण आतंरिक
जागृति और ‘स्व’ को जानने का महान
अनुभव परन्तु आधुनिक धर्मगुरुओं ने
इसे दौलत, ताकत और निजी सत्ता
में तब्दील कर अपनी जागीर बना
डाला है । आजकल आध्यात्म की
हाई-फाई दुकानें होतीं हैं और उस
पर ऊँची तालीम वाले चतुर चालाक
डिग्रीधारी ठेकेदार ।
भारत आदिकाल से मंदिरों, मठों,
ऋषियों, मुनियों एवं सन्त-महात्माओं
का देश रहा है । यहाँ के ओजस्वी
अवतार पुरुषों ने विश्व भर में अपनी
प्रखर ज्ञान-ज्योति का प्रकाश
फैलाया। योग, ध्यान, आराधना और
साधना के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना
का साक्षात्कार हीं इन महान सन्तों
का उद्देश्य हुआ करता था । इसके
लिए ये जंगलों में कुटिया बनाकर
“धर्म की विडम्बना “
अथवा पहाड़ों की कंदराओं, गुफ़ाओं
जैसे निर्जन, एकांत स्थानों पर रहा
करते थे । ये तो हुई तब की बात पर
आज के परिपेक्ष्य में देखें तो इस देश
में मल्टीप्लेक्सों का अभाव तो हो सकता
है पर आश्रमों का नहीं । आज हिन्दुस्तान
में साधु-सन्तों की कोई कमी नहीं है,
परिवर्तन केवल इतना आया है कि
आज के स्वयंभू सन्त कुटिया में नहीं
बल्कि फाइव-स्टार होटलों की
सुविधाओं से लैस आलीशान आश्रमों में
रहते हैं … जहाँ वे किंग साइज़ डबल
बेड के मखमली बिस्तर पर सोते हैं,
इनका पर्सनल स्विमिंग पूल तक होता
है और ये साधना में लीन रह कंद-मूल
खाकर जीवन बसर करने के बजाय
शक्तिवर्धक दवाइयों का सेवन किया
करते हैं । ना सिर्फ़ ऐश्वर्य की सारी
वस्तुएँ अपितु इनके पास हथियारों का
जखीरा एवं कम पढ़े-लिखे निम्न
मध्यमवर्गीय सीधे-साधे वफ़ादार
अंधभक्तों का शुद्ध यूरेनियम भी मौजूद
होता है जिससे वे जब चाहें इच्छानुसार
परमाणु बम तैयार कर सकते हैं जो
पुलिस और कानून से उनकी सुरक्षा
के लिए सदैव मौजूद होता है । ये
वैसे भोले-भाले लोग होते हैं जो
अपनी पीड़ाओं के निदान के लिए
किसी चमत्कार की आशा में इन
बाबाओं के आगे नतमस्तक रहा करते
हैं । एकान्तता, ब्रह्मचर्य, तपस्या और
गरिमा के साथ आत्मसाक्षात्कार की
साधना में अपना पूरा जीवन अर्पण
कर देने वाले महान सन्तों, सन्यासियों
का त्यागी स्वरुप ना जाने कब
रूपांतरित होकर छद्म और
स्वार्थपरता की राजनीति करनेवाले
प्रपंची तत्वों में तब्दील हो गया एवं
दिग्भ्रमित करने की कला में निपुण
इन तथाकथित धर्मगुरुओं ने सीधे-साधे
भक्तों को गुमराह करने में कोई कसर
नहीं छोड़ी । वेदांत कहता है कि
संसार में दुःख का कारण अज्ञान या
अविद्या है किन्तु जब पढ़े-लिखे
सुशिक्षित लोग भी ( सुना है बाबा
रामपाल बी.टेक इन्जीनियर हैं ) धर्म
के नाम पर इस तरह का छद्म
करने लगें तो इसे धर्म की विडम्बना
नहीं तो और क्या कहा जाएगा ?
– कंचन पाठक.

 


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