लोग मंगल का पर्व है दीवाली

उत्तर में कहते है इस दिन
अयोध्या के राजा श्री
रामचन्द्र जी लंका के
राजा रावण को मार कर
अयोध्या वापस आए थे।
इन्हीं के स्वागत में लोगों
ने अपने-अपने घरों को
दीप मालाओं से सजाया
था। तब से लेकर आज
तक यह परम्परा चली आ
रही है।

दीवाली लोक मंगल का पर्व है।
हर साल कार्तिक मास की अमावस्या
के आते-आते सारा वातावरण एक
विशेष किस्म के हर्षोल्लास से भर जाता
है। दिए जलेंगे, पटाखे फूटेंगे। कहीं पर
भी अंधकार नहीं रह जाएगा। सम्पूर्ण
धरा को अंधकार से प्रकाश में बदल देने
का त्योहार है। मान्यताएं भले ही
अलग-अलग हों, रीति रिवाज
अलग-अलग हों लेकिन भावना एक
है-असत् से सत्, अंधकार से प्रकाश,
दुख से सुख दारिद्रय से समृद्धि, नाश
से अमरत्व की प्राप्ति।
इस दिन हिन्दू लोग अपने-अपने
घरों को दीप मालाओं से सजाते हैं।
लोग मंगल का पर्व है दीवाली
महालक्ष्मी की पूजा षोडश उपचारों से
करते हैं। देश के पूर्वी भाग में महाकाली
की पूजा का रिवाज है। दक्षिण में कहते
हैं कि इस दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर
नामक राक्षस को मारा था। नरकासुर
का वध रात्रि में तीसरे पहर हुआ था,
अतः वहां दीपावली रात्रि के तीसरे पहर
ही मनायी जाती है। आधी रात के बाद
पटाखों के धूम-धड़ाके से उल्लास का
वातावरण बनता है।
उत्तर में कहते है इस दिन
अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र जी लंका
के राजा रावण को मार कर अयोध्या
वापस आए थे। इन्हीं के स्वागत में लोगों
ने अपने-अपने घरों को दीप मालाओं
से सजाया था। तब से लेकर आज तक
यह परम्परा चली आ रही है किंतु इन
सारी लोक मान्यताओं के पीछे दीपावली
मनाने का वैज्ञानिक पहलू और इसमें
छिपी लोक मंगल की भावना सुस्पष्ट
है।वर्षा ऋतु में घरों में जो सीलन,
गंदगी हो जाती है, वह इस त्यौहार पर
साफ की जाती है ताकि किसी भी किस्म
का प्रदूषण घरों में न रह जाए। सरसों
के तेल का प्रकाश स्वयं रोगाणु नाशक
व कीटनाशक होता है। इस पर्व में
परम्परागत रूप से उसी को मिट्टी के
दिए में जलाया जाता है।
वास्तव में यह पर्व दुख एवं
दारिद्रय के सम्पूर्ण नाश का अनुष्ठानिक
प्रतीक है जो प्रेरणा देता है, बल देता
है, आत्म कल्याण के लिए कर्तव्य पथ
पर बढ़ने को किंतु विडम्बना यह है कि
दीवाली तो सदा-सदा से इसी तरह
मनायी जाती रही है किंतु क्या रोग नष्ट
हो गए? दुख नष्ट हो गए? दारिद्रय
नष्ट हो गया? असत नष्ट हो गया?
नहीं। आखिर क्यों? यह प्रश्न कचोटता
है बाजारवाद के दौर में।
वस्तुतः अंधकार कुछ नहीं, प्रकाश
का अभाव है। असत् कुछ नहीं, सत् का
अभाव है। दुख कुछ नहीं, सुख का
अभाव है। दारिद्रय कुछ नहीं, समृद्धि
का अभाव है परन्तु इस सब के लिए
ज्ञान चाहिए। असत् की सत् नहीं है और
सत् का अभाव नहीं है। सत् है। कहीं
दूर नहीं बिल्कुल सन्निकट। अपने ही
भीतर। उसे उघाड़ने की जरूरत है।
उसे पहचानने की जरूरत है। यदि
ज्ञान के प्रकाश में मनुष्य ने ‘सत्‘ को
पहचाना तो वह उससे जुड़ेगा। जब
मनुष्य उस से जुड़ेगा, तभी उसके
जीवन में सच्चे आनंद का प्रकाश होगा
किंतु जरूरत है सच्चे ज्ञान की, सच्चे
कर्म की और सच्ची वचनबद्वता की।
यह वचनबद्धता ही भक्ति है।यदि
जीवन में ज्ञान, कर्म और भक्ति का
तिकोना साकार हो जाए तो दीपावली
के उद्देश्य की प्राप्ति हो सकती है परंतु
जरूरत है इसके लिए आत्मदीप को
प्रज्ज्वलित करने की। मिट्टी के दिए तो
प्रतीक भर हैं। दीपावली के अवसर पर
इसे समझना होगा।