ऑड-ईवन की सामाजिकता

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डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला (हंसराज कॉलेज) चारों तरफ प्रदूषण की चर्चा, उसके भयंकर परिणामों की अकथ कहानी को सुनते और देखते हुए दिल्ली सरकार ने अपील के रूप में ऑड-ईवन का फार्मूला जनता के समक्ष रखा56। ऑड-ईवन की गाड़ियाँ तारीख के अनुसार चलेंगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरंतर बढ़ती प्रदूषण की समस्या पर लगाम कसने के प्रयासों, सुझावों एवं गंभीर बीमारियों से ग्रस्त छोटे-वृद्ध वर्ग का समाज जूझता नज़र आ रहा था। पहली बार दिल्ली सरकार (आप पार्टी) ने एक ऐतिहासिक कदम उठाकर अपील के रूप में, प्रयोग के रूप में ऑड-ईवन नंबर की गाड़ियाँ दिनाँक के अनुसार चलाने का प्रयास  किया। 15 दिनों तक यह प्रयोग के रूप में करने की प्रार्थना के विरोध पर कुछ लोगों ने कमर कस ली और प्रयोग सफल ना हो सके इसके लिए तमाम दलीलों की बौछार करनी शुरू कर दी।

पर धुन की पक्की, कर्म हठी दिल्ली सरकार अपने कथन पर अडिग बनी रही और उसके प्रयासों का परिणाम सुखद रूप में दिल्ली की जनता के समक्ष तो आया ही पूरा भारत ही इसकी प्रशंसा करने लगा, आलोचक भी दबी जुबान से बुदबुदाने लगे।

भाइयो! यह प्रयास ऐतिहासिक था, जिसकी जीत हुई। सभी ने इसकी सराहना की, चाहे गाल बजाने वाले ही क्यों न हो। सामान्य तौर पर पूरे दिन किसी भी स्थान से किसी भी स्थान पर आसानी से जाया जा सका। रेड़ लाइट पर दो-तीन बत्ती का तक खड़ा नहीं होना पड़ा। इससे यात्रियों को जाम से तो राहत मिली ही साथ ही साथ प्रदूषण  से भी राहत मिली। गाड़ियों का धुआँ ज़हर छोड़ता कम नज़र आया। लोगों ने सरकारी वाहनों का प्रयोग किया और कार-पूल की योजना बनाई।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लोगों को पहली बार यह लगा कि यदि सरकार ऐसा कर रही है, तो हमें उसमें सहयोग देना चाहिए, उसमें हमारी सच्ची भागेदारी, हिस्सेदारी होनी चाहिए, जो जनता ने कर दिखाया। लोगों ने अपने पड़ोसी, सह-कर्मियों से बातचीत करना प्रारंभ कर दिया। एक ऐसा माध्यम बना ऑड-ईवन गाड़ियाँ का, जिससे लोगों में सामाजिकता का भाव उत्पन्न हुआ। लोगों ने राम-राम, नमस्कार, करते हुए आस-पास में टटोल कर आने-जाने की व्यवस्था कर दी। स्त्रियों ने पुरूषों से हँसते हुआ कहा- भाई साहब! आज आप हमारे साथ कार्यालय तक चल सकते हैं। मुझे तो यह फार्मूला संजीवनी की तरह से लगा। जिस समाज में लोग बिना मतलब के बोलते तक नहीं, वे हँस-हँस कर आत्मीयता का भाव दिखलाते नज़र आ रहे थे। जैसे लोगों ने कारगिल के समय दिल खोलकर तन-मन-धन अर्पित किया, वैसे ही लोग अपनी कार में चार सहकर्मी या पड़ोसी को बिठाते, खुद उनके साथ अगले दिन जाने की मीठी मनुहार करते नज़र आ रहे थे। लोग ढूँढ रहे थे कि इस दिन कार्यालय जाना है तो इस दिन की नंबर की गाड़ी का कौन व्यक्ति अपनी सोसायटी में रहता है। जानते ही मंद-मंद मुस्कराते उससे मिलते है और वह भी अपनी समस्या का निजात पाने पर गर्वित सा नज़र आता।

पूरी दिल्ली ही एक सूत्र में बँधी नज़र आने लगी। दिल्ली जैसे महानगर की सड़कों पर रेलम-पेलम का नज़ारा कम हुआ। घंटों की दूरी, लंबी रेड लाइट का इंतजार खत्म होने लगा। लोगों को समय की बचत, धन की बचत और प्रदूषण से होने वाली भयंकर बीमारियों से निज़ात पाने की आशा अवश्य 15 दिनों में बँधी। सभी समाचार  पत्रों में सर्वो की समीक्षा द्वारा जनता को आराम की स्थिति में पाया गया। जनता की मंशा पुनः इसे लागू करने की दिखलाई देने लगी। एक जनवरी से 15 जनवरी, 2016 तक का समय दिल्ली सरकार द्वारा ऐतिहासिक सामाजिक बद्धता को दर्शाने के रूप में माना गया है। यद्यपि सरकार ने कम समय में पूरे प्रयासों द्वारा सफल बनाने का कार्य किया, जनता का सहयोग पाकर सरकार गर्वान्वित भी हुई और सरकार  ने जनता का धन्यवाद भी प्रकट किया।

सरकार द्वारा छूट दिए जाने वाले वर्ग को मलाल रह गया कि सरकार हमें छूट क्यों दे रही है, क्या हम अपनी भागीदारी स्त्री होने के कारण नहीं दे सकते हैं। समाज को उन्नत एवं स्वस्थ बनाने के लिए वे भी अपना सहयोग देना चाहती हैं। उन्होंने छूट मिलने पर भी अपनी सहभागिता के लिए पूरे नियमों का पालन किया और मंशा व्यक्त  की आगे भी हम पुरूषों की भाँति खुशी-खुशी हर्ष भाव से सहयोग देंगी। यह दिल्ली हमारी है और दिल्ली को स्वस्थ रोगमुक्त बनाने के लिए हम एक साथ दिल्ली सरकार के साथ काम करेंगे। पूरा तंत्र एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना कर्म करते हुए सुखद अनुभव किया और कहीं किसी प्रकार की अभद्रता एवं मारपीट की कोई सूचना नहीं मिली। फूल देकर कार्यकर्ताओं द्वारा विनम्रता की सीख ने वास्तव में मनुष्यों को कर्तव्य का पाठ खुशी-खुशी पढ़ाया, लोगों ने भी खुशी-खुशी पढ़कर कर्तव्य निभाया। त्योहार के रूप में 15 दिन तक यह कार्यक्रम सुचारू रूप से चला। सरकार द्वारा साइकिल के प्रयोग की बात भी कही गई। मेरे विचार से यह अच्छा हो कि 8-10 किलोमीटर तक अगर सरकारी कार्यालयों में जाने वाले साइकिल का प्रयोग खुशी से करें, जो साइकिल द्वारा आ-जा सकते हैं। उनको प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा अगर कोई प्रोत्साहन-उत्साह हेतु स्कीम भी चलाई जा सकती है जिस प्रकार  हिंदी में कार्य करने हेतु राजभाषा द्वारा प्रमाण-पत्र, इंक्रीमेंट दिए जाते हैं। इससे लोगों का उत्साह तो बढ़ेगा ही स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा ‘आम के आम गुठली के दाम’ वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी। मेट्रो स्टेशन पर लगातार यह स्लोगन दिखाई पड़ता है सीढ़ियों का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

यह कहा जा सकता है कि जब जनता अपने बच्चों के भविष्य के लिए त्याग करने को तैयार है, सहयोग देने के लिए तैयार है तो नेता लोग आपसी भेद-भाव, पार्टीगत दृष्टिकोण से ऊपर उठकर क्यों नहीं सोचते हैं। सुन्दर एवं स्वस्थ समाज के लिए वर्तमान में जीते-जीते ही समाधान निकालना होगा। ऐसे प्रयासों की प्रशंसा खुले मंच से करनी चाहिए। साथ ही भरपूर सहयोग देने के लिए कटिबद्ध होकर तैयार रहना चाहिए, तभी हम तमाम समस्याओं का समाधान पा सकेंगे।

 


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