पूर्ण पुरुष, युगपुरुष

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मानव जन्म क्या

एक बुदबुदा है

और उसका जीवन

एक कर्म,

कर्म अपूर्व कर्म पर

जब यह कर्म

अधूरा रह जाता है

किसी के प्रति, तब

एक कसमसाहट

कुछ यंत्रणाएँ

असहनीय तड़प

अव्यक्त पीड़ा

मन मस्तिष्क

में लिए

वो बुदबुदा

नया रूप लिए

फिर आता है

क्यों क्या, का

कर्म पूरा करने को

या किसी को, कर्म में

सहभागी बनाने को

नहीं जानता, जीवन

तू अपने नाम

में पूर्ण है, लेकिन

आत्मा में पूर्ण नहीं

वो तुझसे कहीं परे

अपने विस्तार

को बढ़ाये हुए

होने पर

सिमटी है

तुझमें छिपी है

शायद तुझे

मान, सम्मान

यश देने को

उस की आवाज़ सुन

उस की बात गुन

उस के संस्कार चुन

तभी तू पूर्ण जीवन

कहलायेगा,

कहलायेगा

पूर्ण पुरुष, युगपुरुष…

( तुषार राज रस्तोगी)