विभा रानी श्रीवास्तव

 

तारे बराती , अम्ब धरा की शादी, रवि घराती ।

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धरा आँचल,  अनेक चाँद बने, सफेद सोना ।
स्फुटित मिले , कपास सेमल से , चाँद के टीले ।

चट करती , तम्बू तानता सूर्य , शीत सताती ।

पड़ोस राही , कॉफी सहेली शीत , विदा हो गई ।

हँसते बौर , खिलखिलाते रुई , शीत बिदाई।

ढीठ आकांक्षा , अफरी शीत धारा , बिछुड़ती लौ ।