स्वयंसिद्धा हो तुम – गोरक्ष जाधव

स्वयंसिद्धा हो तुम
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नारी स्वयंसिद्धा हो तुम,
तुम शक्ति हो जीवन की,
चेतना,स्फूर्ति हर तन की,
अद्भुत है तेरी माया
संजीविनी हो मन-मन की।
नारी स्वयंसिद्धा हो तुम…
जगत जननी महामाया,
हर दृश्य की हो काया,
तुम निरंतर परिवर्तित रूप हो
परमपुरुष की हो तुम छाया।
नारी स्वयंसिद्धा हो तुम…
हर सजीव की संवेदना हो,
हर संघर्ष की प्रेरणा हो,
उसके बगैर कल्पना नहीं जीवन की,
तुम हर जीत की उत्तेजना हो।
नारी स्वयंसिद्धा हो तुम…
साहस हो,ओज हो,
हर कला की खोज हो ,
जीवन सरिता में उठती,
सुख-दुख की मौज हो।
नारी स्वयंसिद्धा हो तुम….
तुम शक्ति ही , तुम भक्ति हो,
शिव की अनन्य अभिव्यक्ति हो,
तुम काल की भी हो महाकाल,
जीवन संघर्ष की मुक्ति हो।
नारी स्वयंसिद्धा हो तुम,
शक्ति हो अभिव्यक्ति हो तुम।
गोरक्ष जाधव©®
मंगलवेढा, महाराष्ट्र
