नारी – आभा सिंह

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#विषय – नारी
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मैं गर्व गरिमा,मैं देव प्रतिमा,
मैं ही कृष्णा का मान हूँ..
मैं ही रक्त अरूण अरूणिमा,
मैं ही मीरा का विषपान हूँ..
मैं ही अवनि और मैं ही अंबर,
मैं ही सकल सम्पूर्ण विस्तार हूँ..
मैं ही माली और मैं ही उपवन,
मैं ही इस सृष्टि का सार हूँ..
मैं ही भूत,भविष्य,वर्तमान हूँ,
मैं ही उपमेय और उपमान हूँ..
करुणा,धैर्य,शौर्य की परिभाषा,
मैं ही माँ अन्नपूर्णा की खान हूँ..
मैं त्याग व बलिदान की मूरत,
मैं नारी जीवन का आधार हूँ..
ममता व प्रेम की पराकाष्ठा मैं,
मैं ही प्रीत का पारावार हूँ..
मैं नारी कोमल हूँ कमजोर नहीं,
मैं भी नभ में उड़ान भरना चाहूँ..
पुरूष प्रधान इस समाज में,
मैं भी नया इतिहास गढ़ना चाहूँ..
शक्ति स्वरूपा नारी हूँ,अभिसारी हूँ,
मैं ही श्रद्धा वात्सल्य की बहार हूँ..
लक्ष्मी,सरस्वती,दुर्गा और रणचंडी,
मैं ही माँ कालिका का अवतार हूँ..
नारी के शृंगार की अपनी स्वर्णिम गाथा है,
वैरागी शिव भी जिसके आगे सांसरिक हो
जाता है !!
आभा सिंह
वाराणसी
