विधार्थी – डॉ अशोक (बिहार)

विधार्थी।
विधा चाहने वाला विधार्थी,
कहलाता है।
यह ज्ञान रूपी उपक्रम में,
बालक किशोर युवा व,
वयस्क भी उन्नत भाव में,
समाज के इस जंग में ,
हृदय से उतर आता है।
सुख चाहने वाले विधार्थी,
यह सुख कभी नहीं पाता है।
विधा अर्जित करने वाला ही,
विधार्थी कहलाता है।
यह साधना और तपस्या का,
एक उत्तम जीवन है।
एकाग्रता और गहन परिश्रम से,
मिलता नवजीवन है।
यह अध्ययन और ज्ञान चिन्तन का,
सर्वोत्तम काल है।
संसारिक भटकाव से,
दूर रखता इसे महाकाल है।
विधार्थी की नींव रखी,
रखीं जाती है इस काल में।
नवजीवन देने में गुरु श्रेष्ठ,
पढ़ाते हैं सम्पूर्ण काल में।
विधार्थी जीवन दुनिया का,
सर्वोत्तम उपहार है।
खुशियां बटोरने का यह,
एक स्वर्णिम संसार है।
मां शारदे की वंदना और,
परिश्रम से पुस्तक संरचना,
सम्पूर्ण पवित्र कार्य है।
सफ़र में आगे बढ़ने के लिए,
बन गया अपरिहार्य है।
कालों में स्वर्णिम काल में,
विधार्थी जीवन कहलाता है।
विप्लव गान करते हुए,
ज़िन्दगी का तीर्थ यह काल,
सदैव कहलाता है।
विधार्थी समर्पण है,
गुरु शिष्य अर्पण है।
पुस्तक प्रकाश में दिखता,
उन्नत आकर्षण है।
विधार्थी जीवन में खुशहाली,
अपूर्व मिलता है।
मित्रता और अपनत्व ही,
यह काल खरीदता है।
संयुक्त संस्कार में,
विधार्थी जीवन,
अद्भुत चमत्कार ।
बचपन की यादें ,
को यहां ताजा करना,
है इसका व्यवहार ।
सुख-दुख से दूर,
विचार में भरपूर,
चिंता की दूरी नहीं,
भावना की सीमा नहीं,
हरपल आनन्द ही,
आनन्द का सरोकार है।
जीवन मंत्र बतलाता है,
विधार्थी जीवन में,
विधार्थी को हरपल देता,
खुशहाली अपार है।
मित्रों से सम्मोहित,
वचन पर गम्भीरता,
उन्नत भाव से सृजन,
भावविह्वल में उत्तम,
विधार्थी जीवन कहलाता है।
सहनशीलता व सादर अभिवादन,
सागर में गोते लगाने जैसा,
पवित्र मन में उर्जा,
खूब खुशियां व अपार लीला,
सब साथ-साथ ले आता है।
गुरु के प्रति सम्मान ,
आदर और निष्ठा,
अनोखी सम्पूर्णता इसकी,
उन्नत विशेषता है।
विधार्थी सदैव जीवंत,
व उत्तम जीवन में,
सुख-शांति का सहर्ष गुणों से,
हम-सब को आत्मसात कराता है।
संस्कारों को जिवंत रखने वाले,
सदैव जीवंत भाव से,
गुरु श्रेष्ठ का आशीर्वाद पाकर,
उन्नति प्रगति के शिखर पर,
शीघ्रता शीघ्र पहुंच जाता है।
सारा सच का यह ,
मानों सम्बल प्रयास व ,
जीवन की लहर है।
ज़िन्दगी में यह उपक्रम,
दिखता काफी प्रखर है।
विद्वान पंडित छात्र वृत्तिधारी,
शागिर्द भी कहलाता है।
कभी -कभी यह अवतार,
चेला व शिष्य स्वरूप में
स्वीकार्य किया जाता है।
अनुगमन अनऺतर विद्वान व,
अनुरूप भी है इसके रूप।
सर्वत्र व्याप्त है और दिखता,
बनकर रह विधार्थी एक ,
सदैव सम्बल स्वरूप।
विधार्थी में हो कौए की चेष्टा,
ध्यान हो जैसे बगुला के जैसा,
रहता हरपल जैसे ध्यान।
कुत्ते की नींद की माफिक,
हरपल दिखता ज्ञान सौंदर्य ही वैसा।
अल्पाहारी गृहत्यागी हैं सब,
इनकी अपूर्व विशेषताएं यहां।
अल्पाहारी कम भोजन,
अद्भुत संस्कार कहलाता है।
गृहत्यागी हैं मां- बाप से,
मोह का त्याग जो यहां,
दूर रखने का आन्दोलन,
सर्वत्र कहलाता है।
प्रेरणादाई समरसता खूब,
खुशियां संग आतीं हैं यहां।
सारा सच ने किया दृढ़ संकल्प,
समग्र मूल्यांकन जारी हैं यहां।
पुरानी परम्परा यह कहता है कि,
विधार्थी को मिलता है,
सम्पूर्ण व्यक्तित्व का ज्ञान।
इसके लिए हैं सृष्टि का है,
एक अध्याय चार ज्ञान।
एक चौथाई ज्ञान का श्रेय
गुरु श्रेष्ठ को जाता है।
एक चौथाई का श्रेय यहां,
अपनी बुद्धिमत्ता फक्र कहलाता है।
एक चौथाई का श्रेय यहां ,
सहपाठियों से मिलती ज्ञान है।
अन्तिम अधिगम मिलता है,
समय काल अनजान हैं।
सारा सच का यह ऊधम,
बन चुकी है उन्नत खोज अभिमान।
हम-सब मिलकर खूब प्रयास करें,
विधार्थी जीवन को खूब दें हम सम्मान।
मान लें मां -बाप जैसे स्वरूप,
हृदय से करें आभार और खूब दें सम्मान।
अभिनन्दन हो उत्कृष्ट शिखर सा,
जिससे देश को हों अभिमान।

डॉ ०अशोक, पटना, बिहार।