हाँ,मै एक डॉक्टर मौकापरस्त हूँ – डॉक्टर सुलेखा यादव

हे समाज,ना बनाओ मुझे भगवान,
मै भी हूँ एक साधारन सा इन्सान,
मै भी अपनी नीन्द गँवा करता इलाज हूँ,
हां,मै एक मामुली सा डॉक्टर मौकापरस्त हूँ।

जब सभी ज़िन्दगी के रागों मे पड़े मस्त थे,
मै अपने किताबों मे उलझा,परीक्षा देने और पास होने मे व्यस्त था,
पोस्टिंग,पढ़ायी,मरीज मे उलझ कर भी कभी सह्ज तो कभी त्रस्त हूँ,
हां,मै एक डॉक्टर मौकापरस्त हूँ।

तुम अपने घर मे खुशियाँऔर जश्‌न मना रहे थे,
हम 48 घन्टे की ड्यूटी कर अपना कर्तव्य निभा रहे थे,
त्योहार,छुटियां,और दिवाळी की जगमग से मै बहुत दूर हूँ,
हां,मै एक मरीज के लिये हर खुशियाँ न्योछावर कर भी डॉक्टर मौकापरस्त हूँ।

जाती -धर्म से उपर हमने मदद को हाथ बढ़ाया है,
इस कोरोना काल मे भी हमने अपनी जान गवाँकर कितनो की जान बचाया है,
दिन हो या रात,रविवार हो या त्योहार,ठीक हूँ या बिमार,लोगों की जान बचाने को तत्पर खिदमत कर पस्त हूँ,
हां,मै कोरोना वारीयर्स बन,एक डॉक्टर मौकापरस्त हूँ।

इसके बाद भी आपका हक नहीं बनता मुझपे झूठे आरोप लगाने का,
अपनी दोहरी मानसिकता का नन्गा नाच ज़माने को दिखाने का,
तुम्‌हारे जनने वाली माँ के साथ मै भी तुम्‌हे बाहरी दुनिया दिखाने का भागीदार हूँ,
तुमहारी माँ के बह्ते खून को रोकने को दवाई के साथ साथ भगवान से लड़ने को नदमस्तक हूँ,
हां,मै एक सख्त इन्सान के साथ -साथ एक डॉक्टर मौकापरस्त हूँ।

अपना हक मान्गा तो बन गया अविनीत,
थोड़ी आँख लग गयी तो लापारवाही का आरोप लगा बना दिया निकृस्ट,
फीस लेने मे मै हो जाता लूटेरा हूँ,
अस्पताल चलाने पे हो जाता जान का व्यापारी हूँ,
इतनी उम्मीद डॉक्टर से क्यों,मैं भी तुकड़े तुकड़े जोड़ रात को करता उजाला करने में व्यस्त हूँ,
हां,मै भी आपकी तरह एक इन्सान हूँ और बाद मे डॉक्टर मौकापरस्त हूँ।

हमसे मुफ्त मे इलाज की उम्मीद क्यों,
हम अपनी पढाई मे जवानी के साथ -साथ अपना खेत भी गवाते यूँ,
मै पहले से ही समाज को अपना वक़्त के साथ -साथ अपना अक्स भी मिटाने को तैयार और खुद को करता व्यक्त हूँ,
एक आम इन्सान के साथ -साथ रोग -दोष के लिये हाहाकार और मैं डॉक्टर मौका परस्त हूँ।

#सारासच
डॉक्टर सुलेखा यादव
दिल्ली