कोरोना – प्रा.गायकवाड विलास.

**प्रतियोगिता के लिए रचना*
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**विषय : कोरोना**
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**कुछ मानवता के दीप*
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( मुक्तछंद काव्य रचना )

वक्त के आगे छोड़कर अहंकार ,
कुछ मानवता के दीप तुम जलाओ।
हम सबकी है एक ही मातृभूमि ,
तो सब मिलकर इन्सानियत का फर्ज निभाओ।

कोरोना ने मचाया है ये कोहराम कैसा,
उसी कोरोना के साथ हम सबको यहां लड़ना है।
मानवता से बड़ा नहीं है कोई धर्म यहां,
यही आज हम सबको यहां दिखाना है।

कितने भी आयें वो आंधियां और तुफ़ान,
हिमालय बनके हम सबको यहां खड़ा होना है।
एक दुसरें का साया बनके हमें यहां,
आयें आफतों को जड़ से ही मिटाना है।

कल भी हम एक थे,आज भी हम एक हैं,
पुरे विश्व में आज भी हमारे चर्चे हैं।
रंग चाहें जितने भी हो अलगता के हमारे,
उसी रंगों को मिलाकर इंद्रधनू हमें बनना है।

जब भी आती है किसी संकटों की बात,
हम सब यहां एक ही भारतीय बन जाते हैं।
वक्त चाहें जितना भी हो कठिन ,
सब मिलकर एकता से हम जीत जाते हैं।

स्वातंत्र्य,समता,एकता और बंधुता,
यही हम सब भारतीयों का नारा है।
ऐ,वक्त तू कितनी भी ले परिक्षायें हमारी,
हर इम्तिहान से सफलता हमें पाना है।

विलास के ये लफ़्ज़ों के अनमोल मोती,
तुम्हें चीख चीखकर पुकार रहें हैं।
मानवता के दूत बनकर यहां पर ,
आज हमें यहां उस कोरोना को भी हराना है।

प्रा.गायकवाड विलास.
मिलिंद क.महा.लातूर.
महाराष्ट्र
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