घुंघट का सच – सीमा टेलर

 

घुंघट का सच
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घुंघट में ढका हो चेहरा या फिर पहचान छिपी हो हिजाब में,
प्रथा यह कौन सी, कीमत जो चुकाई नहीं है हिसाब में।
माना सुंदर मुखड़े को निर्वस्त्र करती नजरों से बचाना था,
पर क्या बांध बेड़ियां, शिकंजा कस पहरे में रखना जरूरी था।।

हमारे जन्म को एक त्यौहार तो ना बना पाए,
हर अवसर पर सजावटी सामान समझते चले गए ।
जंजीर रुढियों की पैरों से निकाल तो ना पाए,
पैरों की अंगुलियों में बिछुवा वो पहनाते चले गए।।

क से कबूतर ख से खरगोश तो ना सिखा पाए,
जमाने भर का ज्ञान सिखाने का दावा करते चले गए।
उजाला करने की अदद कोशिश तो ना कर पाए,
अंधेरे और गुमनामी भरे जीवन में धकेलते चले गए।।

बराबरी का दर्जा दे गर्दन तो ऊंची ना कर पाए,
नथ में सोने का वजन वो बढ़ाते चले गए।
उन्हें परंपराओं का प भी ना सिखाया गया,
हमें परंपराओं के तारों में उलझाते चले गए।।

हमें खुले आसमान में सांस भी न लेने दिया,
उन्हें पिंजरे की कैद से आजाद रखा गया।
मर मर के जीने को तो कहा गया,
जिस्म जुल्म की आग में झुलसता रहा।।

काश मैंने क्रोध कर लिया होता,
काश मैंने विरोध कर लिया होता।।

पर्दे की आड़ में अरमानों का गला घोटना तो ना पड़ता,
खुद के शहर में खुद का वजूद युं ढूंढना तो ना पड़ता।
तहजीब के नाम पर बंदिशों में जकड़ना तो ना पड़ता,
एक तरफा रिवाज का बोझ युं ढोना तो ना पडता।।

ढकी, छिपी नुमाइश के बाजार में औरत न जाने कहां रह गई,
खुद ही से रूठी खुद ही से जुदा खफा खफा रहने लगी।।
भोर फटे दो गज के घुंघट में सिसकने लगी।
सूरज चढे सुलग सुलग फिक्र दफन करने लगी।
शाम ढले उदास हताश कतरा कतरा दर्द से कराहने लगी।
उदग्विन मन पस्त तन स्व अस्तित्व खोने लगी।।

  1. सीमा टेलर।।छिम्पियान लम्बोर।।चूरु।। राजस्थान