संविधान – सीमा टेलर – राजस्थान

“संविधान”
कुछ सपने,
आतुर है आने को
मन मस्तिष्क में घर करने को।
मनचाहा करूं,
या फिर मैं सिखाए “सिद्धांत” चलूं।
नई नहीं,
कशमकश यह तो पुरानी रे,
ले तर्क की झड़ी
रणभूमि तैयार खड़ी रे।
स्वतंत्रता के परवानों ने भी
इसी मंथन को झेला था
गोते खाते,
समुद्र की लहरों में खेला था।।
आंचल देखु मां का या,
अंगारों में लिपटी दहकती, बेडियो में जकड़ी सिमटी,
लहू में सनि, सम्मान देखु मैं भारत मां का।।
नई नहीं,
कशमकश यह तो पुरानी रे,
ले तर्क की झड़ी
रणभूमि तैयार खड़ी रे।।
हसरते हर रोज नई बदलती
लिबास जैसे हम हर रोज बदलते।
स्व का देखूं, अपनों का देखूं या
देखूं मैं पल-पल क्षण क्षण कण कण माटी का।।
नई नहीं,
कशमकश यह तो पुरानी रे,
ले तर्क की झड़ी
रणभूमि तैयार खड़ी रे।।
एकाएक जमीर चिल्लाया,
अंतर्द्वंद में क्यों है फसा।
संघर्ष तूने जीता है,
प्याला अमृत का पीकर,
मूल्य “सिद्धांत” का पहचाना है।।
जीवन पर्यंत था जिसको पाला पोसा,
खरा अब उसको उतरना होगा,
इम्तहान से गुजरना होगा।
पिरो “सिद्धांत” की माला को
“संविधान” तुझे अब बनाना है,
सच की राह पकड़ कर
निज जीवन को संवारना है।।

सीमा टेलर।।छिम्पीयान लंबोर।

।चूरु राजस्थान