समय से संवाद – मनीषा आवले चौगांवकर

पुस्तक जहां मन के भावों और विचारों का मंच सजता है।पुस्तक केवल काग़ज़ों का संकलन नहीं, बल्कि समय, अनुभव और संवेदना का सघन संवाद जो मनुष्य के एकांत में उसकी  विश्वसनीय मौन संगिनी बनकर उपस्थित रहती है। जब शब्द मौन हो और भाव दिशाहीन, तब पुस्तक अपने पृष्ठ खोलकर हमें  समझने और स्वयं से मिलने का अवसर देती है। पुस्तक पढ़ना किसी विचार से गुजरना नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर तक टटोलना है।
छायावादी कवियत्री महादेवी वर्मा ने कहा है “पुस्तकें केवल ज्ञान नहीं देतीं, बल्कि जीवन को देखने की दृष्टि देती हैं।नया दृष्टिकोण मनुष्य को संवेदनशील, विवेकशील और उत्तरदायी बनाता है। पुस्तक समाज का दर्पण भी एवं भविष्य का संकेतक भी। वह पीढ़ियों के मध्य संवाद का सेतु  है, जहाँ अनुभव परंपरा में और विचार संस्कार में परिवर्तित होता है।
—-पुस्तक मनुष्य और समय के बीच चलता हुआ एक सतत संवाद है। वह केवल पठनीय नहीं ,बल्कि अनुभव की जाती है। प्रत्येक पुस्तक अपने पाठक से प्रश्न पूछती है और कुछ अनुत्तरित अनुभूति छोड़ जाती है! यहां से मनुष्य को सकारात्मक दिशा ,स्वयं में पूर्णता की जद्दोजहद आरंभ होती है।पुस्तक मूल्य उसके आकार या पृष्ठों की संख्या में नहीं, बल्कि उस मौन मीमांसा दर्शन में है जो पढ़ने के साथ भीतर ठहर जाता है।विद्वान साहित्यकार अज्ञेय ने लिखा है कि“पुस्तकें हमें वह नहीं बतातीं जो हम जानते हैं, बल्कि वह दिखाती हैं जिसे जानने का साहस हममें अभी शेष है।पुस्तक विचारों को परिपक्व और दृष्टि को व्यापक करता है!
—-आज के त्वरित और डिजिटल समय में, पुस्तक धैर्य की एक साधना देता है।शब्दों की गहराई..अर्थों के भीतर और स्वयं के पास हमें ठहरना सिखाती है !पुस्तक पढ़ना दरअसल स्वयं से संवाद करने की प्रक्रिया है।
मौन शब्दों का कलरव…न जाने कहां गुम हो चली
 ..वो मौन शब्दों की भाषा!
क्यों कैसै! प्रश्नों का मोल शेष हैิ!!
जीवन में अनकहा बहुत कुछ रह जाता!
पुस्तक के किसी पन्नों में धूमिल शब्दों का भाव….कभी कुछ मौन शब्दों की मीमांसा!
देह जरा मिथ्या है !पुस्तक के उन पीले पन्नों पर
काली स्याही बेरंग सी.. कहे शब्दों की माया!
सत मौन शब्द वो सौंधी माटी से आये..
….करे आलोिकत मन चितवन !
        मनीषा आवले चौगांवकर दिल्ली

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