भक्त – राजवाला पुंडीर

भक्त
भक्त आंसू सदा ही बहाता है क्यों?
माँ चरणों में तेरे वो रोता है क्यों?
बनाती है तू सबको हीरा ही हीरा
तपाती है तू सबको दे दे के पीड़ा
फिर भी आँचल में तेरे ही रोता क्यों?
हर भक्त है तुझे माँ प्राणों से प्यारा
है तेरा प्यार अद्भुत है जग से न्यारा
देख भक्त दर्द दिल तेरा रोता है क्यों?
धर्म के पथ पै चलके भी गिर जाते हैं
फिर भी उठ कर आगे ही बढ़ जाते हैं
धर्म मार्ग में अग्नि ताप होता है क्यों?
सत मार्ग पर चलके बिखरता है रोज
कभी टूटी सी स्वांस ले खोता है होश
अपनी माटी को खुद ही ढोता है क्यों?
तू तो लेती परीक्षा कठिन भक्त की माँ
 तेरी आँखों से धारा बहे रक्त की माँ
तेरे इतना दर्द माँ फिर होता है क्यों?
उनको मिलती है मंजिल सच्ची भक्ति में
उनकी खिलती है कुड़मल सजी पंक्ति में
फिर भी मूर्ख दुखी मन ये होता है क्यों ?
तेरी शक्ति का आभास है माँ आज भी
जो भी लगता असंभव बने वो  काज भी
फिरभी शक इनके मनमें होता है क्यों?
अपनी आवाज को माँ पहुंचा भक्तों तक
अपना आभास भी मां पहुंचा भक्तों तक
 देरी से तेरा विश्वास होता है क्यों?
भक्त सच्चा हो तो हो दिल में तेरा मठ
वक्त अच्छा हो तो पल में मिलता है तट
तेरी चाहत में दर-दर भटकता है क्यों?
सब कहते हैं मैया तो दिल में रहती है
कूड़ा करकट बुहारो दिल में कहती है
बुहारी लगा दिल को न धोता है क्यों?
बन जाती है भक्तों की तू माँ हमसफर
तू माँ देती सहारा हर पल हर डगर
फिर भी दर पर तेरे, भक्त रोता है क्यों?
करती पुंढीर भक्त की भक्ति को नमन
खिलता रहता सदा है भक्ति का चमन
पेन लिखते हुए ये मुस्कराता है क्यों?
राजवाला पुंडीर
उत्तर प्रदेश

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