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गुरू – आभा  सिंह

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माँ सबसे पहली गुरू है,जो सिखाती सब ज्ञान,
उसकी पहले वंदना करो,जो रखे तुम्हारा ध्यान..
गुरू  ब्रहमा, गुरू विष्णु, गुरू ही मेरे  महेश हैं ,
गुरू बिन ज्ञान कहाँ पाऊँ,गुरू ही मेरे परमेश हैं..
गुरू की महिमा सबसे बड़ी,जो है अपरम पार,
जो इसकी महिमा समझ गया,उसकी नैया पार..
गुरू  मिले  तब  ही  मिले, जीवन  में उजियार,
वरना  जीवन  में  रहे  सदा ही  घोर  अंधियार..
गुरू  कहलाते  हैं  गुणी, रच  दे  नव  संसार,
जीवन के हर शब्द  का, गुरू  बतला दे सार..
महिमा  गुरू  की  है  बड़ी, पाया जिसने पार,
पारस  है  ये  ज्ञान  का,गुरू देता  सब  संवार..
गुरू  की  वंदना करके,मुझे आनंद अपार मिले,
गुरू  चरणों की धूल से ,अंतर पट के द्वार खुले..
गुरू  से  कभी  ना  छूटे, ये भाव  का  बंधन  है,
मेरे  गुरू  के  चरणों  में,मेरा  बारम्बार  वंदन  है..
अंधेरे में आज दीया  सी,जो जगमगा रही हूँ मैं,
गुरु के कारण ही जगत में, नाम कमा रही हूँ मैं..
गुरु  के कारण भटकाव  की  सारी  राहें  छोड़ी,
छोड़कर उन राहों को,गुरु चरणों से प्रीत जोड़ी..
गुरु  इस  धरती  पर,भगवान  का  रुप  होते  हैं,
अपने ज्ञान रूपी बीज  से,वो  कई वृक्ष  बोते हैं l
मौलिक
आभा  सिंह
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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