साहित्य

हरियाली – सुरेश कंठ

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हरियाली – सुरेश कंठ

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है पवित्र देखने में
यह मुझे अब आया
अति सुंदर तो जरूर है
मुझे तो यह मन से भाया
       ( 1 )
प्रकृति की रीति यही है
छटा दिखती है निराली
मनमोहक है दिखने में
लगता है  “ हरियाली “
       ( 2 )
यही है परम सत्य अभी
सौभाग्य है इसमें हमारी
स्पष्ट है कितना भला
देखने  में  है  न्यारी
         ( 3 )
 भारत की यह अनुपम छटा
 धरती की सुंदरता भाया
 दिखने में सुंदर  होगी
किसान को सभी ने बताया
         ( 4 )
 हमने बहुत देखा है, सुना है
 आकाश में  चहुं ओर
  लगता बहुत अनंत है
  देखकर यह सब विभोर
           ( 5 )
 कवि की कल्पना है अपरंपार
 होती है बड़ी विशाल
 नहीं इसका कोई जवाब है
 रह जाता है मन में मलाल
            ( 6 )
 थोड़ा सा धैर्य रखें
 समय को पनपने दें
 निकलेगी कुछ निष्कर्ष
आगे पीछे समझने दें
             ( 7 )
 प्रकृति को रहने दें, समतुल्य
       इसे समझना चाहिए
पेड़ – पौधे अत्यधिक लगाएं
इसे नहीं भूलना चाहिए
            ( 8 )
इससे वर्षाजल समय पर होगी
धरती पर “ हरियाली “ रहेगी
तभी पैदावार अनुकूल होगी
किसान खुशी से शांति मनाएगी
             ( 9 )
कहते हैं “ कवि सुरेश कंठ “
जनता जनार्दन को परखने  दें
मामला समझो अति गंभीर है
 हमें भी कुछ संभलने दें
             ( 10 )
            जयहिंद
            “ सुरेश कंठ “
 Bihar

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