ये पर्यावरण नहीं – शकुंतला खंडेलवाल
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माँ है हमारी,
प्राकृतिक संपदाओं से,जो
निःस्वार्थ पालती है,हमे।
आसमां तले,धरती पर
संभालती है हमें ।
मूर्ख इंसान,पग,पग
करता है उसे अपमानित
पेड़,पौधे नोचता है,रौंदता है
और करता है,मनमानी।
सीने पर रख कर पत्थर,
फिर भी दुलारती है हमें।
कोरी बातों,भाषणों के
क्या मायने,
कोसते हो ,सरकार को
सोचो,समझो
ये देश है अपना
याद दिलाकर फर्ज तुम्हारा
माँ भारती पुकारती है तुम्हे
शकुंतला खंडेलवाल
दिल्ली
