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त्याग – डॉ० उषा पाण्डेय ‘शुभांगी’

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त्याग – डॉ० उषा पाण्डेय ‘शुभांगी’
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नास्ति विद्या समं चक्षु:, नास्ति सत्य समं तप:।
नास्ति राग समं दु:खं, नास्ति त्याग समं सुखं।
विद्या समान आँख नहीं, सत्य सामान तप‌ नहीं।
राग समान दुख नहीं, त्याग समान सुख नहीं।
यह श्लोक हमें त्याग का महत्व समझाता है।
त्याग जीवन में कितना जरूरी है, यह हमें बताता है।
त्याग मन का भाव है,
त्याग समर्पण है, त्याग है एक कर्म।
त्याग करना चाहिए, कहता अपना धर्म।
त्याग की कहानियों से, इतिहास भरा पड़ा है।
जिसने जीवन में त्याग किया, वही आगे बढ़ा है।
हर युग ने हमें, त्याग करना सिखलाया।
त्याग से मन निर्मल रहता, यही हमको बतलाया।
अपने अंदर की बुराइयों का, पहले त्याग करो।
गलत काम कभी मत करना,
ईश्वर से डरो।
क्रोध और अहंकार का, नर तुम त्याग करो।
ईमानदारी, सहनशीलता,
खुद के अंदर भरो।
निर्मल मन से, राम नाम भजो।
माया रोकती त्याग को, पहले इसे तजो।
त्रेता युग में प्रभु राम जी, चौदह वर्ष वन में बिताये।
राज-पाट का त्याग किये,
मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए।
कौरवों ने पांडवों को, पांच गाँव नहीं दिया।
परिणाम दुनिया जानती, महाभारत हुआ।
त्याग से आनंद मिलता, मन को होता संतोष।
सद्मार्ग पर चलना मानव,
करना कभी न रोष।
सुखी जीवन जीने के लिए, त्याग करना है पड़ता।
दुनिया उसको मानती,
जो औरों के दुख में साथ खड़ा रहता।
महात्मा गांधी ने, ‘कैसर ए हिंद’ की उपाधि त्याग दिया।
रविंद्र नाथ ठाकुर जी ने,
नाइटहुड उपाधि का, नहीं मोह किया।
सूखा पत्ता झड़ता, तभी तो नया पत्ता है आता।
लालच दुख का कारण है,
मानव समझ नहीं पाता।
उसके मन को शांति मिलती,
जो त्याग कर पाता।
जैसा मनुष्य कर्म करता, वैसा ही फल पाता।
‘काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणम्।।’
कहां गया है विद्यार्थी को, घर का त्याग करना चाहिये।
छात्रों‌ के मेहनत कर, आगे बढ़ना चाहिए।
बहुत कुछ हमें मिला है, थोड़ा सा बस त्याग करें।
औरों के चेहरे पर मुस्कान लाये़ं,
उनकी जिंदगी खुशियों से भरें।
डॉ० उषा पाण्डेय ‘शुभांगी’
स्वरचित
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