
मेरी क़लम – डा, तरूण राय कागा
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मेरी क़लम मेरी पहचान अता-पता नामो-निशान,
चलती सियाही ख़ून बन अता-पता नामो-निशान।
ह़ालात बदतर लूट-खसोट मची हाय तोबा बन,
सेयाद ठहरा शेतान आम अ़वाम ह़ेरान परेशान हैं।
अफ़रा-तफ़री का आलम मसायल का ह़ल नहीं,
सरे बाज़ार में खरीद-फरोख्त करना आसान है।
नहीं निकाह़ी ब्याही दुल्हनिया बहू कहां से आई,
बिना दुल्हे की बारात सारी नोटंकी बदनाम है।
खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे रुक-रूक कर कागा,
करती म्याऊं-म्याऊं घूम-घूम दोगली दास्तान है
क़लमकार
डा, तरूण राय कागा
पूर्व विधायक
कवि साहित्यकार
