
त्याग का रहस्य – अमिता मराठे, मध्य प्रदेश
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घने सेमर वृक्ष के नीचे एक साधु विश्राम कर रहे थे। सूर्य की तपन से राहत मिलते ही उन्हें गहरी नींद आ गई।
शीतल हवा और घनी छाया मानो उनकी तन-मन से सेवा कर रही थीं। जागने पर साधु स्वयं को अत्यंत हल्का और प्रसन्न महसूस करने लगे।
उन्होंने वृक्ष की ओर देखकर कहा—
“हे सेमर वृक्ष! मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।”
वृक्ष मंद स्वर में बोला—
“हे महात्मन्! हमारा धर्म तो केवल देना है। त्याग और समर्पण ही हमारे जीवन के भाव हैं। सामने खड़े मेरे बंधु बरगद को देखिए, जो वर्षों से समस्त प्राणी जगत को निःस्वार्थ दान दे रहे हैं। धरती माँ ने हमें अपनी गोद में स्थान दिया देकर स्नेह दिया है, इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम भी सबका संरक्षण करें।”
साधु ने गंभीर होकर पूछा—
“हे वृक्षराज! आज पृथ्वी पर ऐसी विषम परिस्थितियों का दोषी कौन है?”
सेमर वृक्ष कुछ क्षण मौन रहा, फिर बोला—
“यह प्रकृति और माया का संघर्ष है। माया ने मनुष्य की बुद्धि पर ताला जड़ दिया है। मनुष्य के माध्यम से वह विनाश का तांडव रच रहा है। भगवान ने मनुष्य को विवेक दिया था, ताकि वह नैतिकता और संस्कारों का पालन छंकरे, परंतु उसने उसी विवेक को स्वार्थ की आग में झोंक दिया।”
वृक्ष की वाणी और तीखी हो उठी—
“हम दोनों पृथ्वी की गोद में पले हैं, फिर भी अंतर देखिए—
हम वृक्ष पत्थर खाने पर भी फल देते हैं,
और मनुष्य फल खाने के बाद भी कुल्हाड़ी चलाता है।”
साधु निःशब्द थे।
धरती माँ की पीड़ा अब उन्हें स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
— अमिता मराठे, मध्य प्रदेश
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