साहित्य

श्रमकर्ता – कमल धमीजा 

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श्रमकर्ता – कमल धमीजा
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धूप भी चलती रही छाॅंव भी चलती रही l
संग -संग गृहस्थी की नाव भी चलती रही  ll
ख़्वाब मेरे साथ- साथ चल पड़े मेरे गाॅंव से l
बेफिक्र हूँ चाहे छाले पड़ जाएं मेरे पाॅंव में ll
ऑंखों में सपने सजाकर चल पड़ी हूंँ राह में l
 दो वक्त की रोटी कमाने की इस चाह में ll
मजदूर की बेटी हूँ श्रम से मैं घबराती नहीं l
बोझ कितना भी हो सिर  पर मैं डर जाती नहीं ll
हौसलों की रोशनी उम्मीदों से मेरी भरी l
सभी वो संभाल लेगा खुद आकर मेरा हरी l
@स्वरचित मौलिक अधिकार रचना
कमल धमीजा
फरीदाबाद–हरियाणा

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