
मन बावरा,मन चंचल – उमेश नागभागम भाग करें;
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कहता है कुछ करता है कुछ
और रमता कहीं ओर है।
न चाहूं मैं सोना चांदी,
न चाहूं मैं ध्यान समाधि।
मैं तो हूं सामाजिक प्राणी,
त्रिगुण है भाव मेरा।
सद्-चित-आंनद में ही
रमे मन मेरा,
यही ध्येय है मेरा।
मोह-मद-लोभ के-
चाल से,
सदा दूर रहें मन मेरा।
हैं चाहत कि संकलन –
वृत्ति से दूर रहूं,
उदारता और विकलन-
में ही रहे मन मेरा।
असत् से सत की ओर
गतिमान हो,
समदृष्टा,ज्ञेय और ज्ञाता
हो मेरा।
न कोई प्रतिद्वंद्वी हो-
न कोई बेरी,
समदृष्टा व स्नेहशील हो
यें बावरा – चंचल मन
मेरा।
श्रीमती उमेश नाग जयपुर राजस्थान
