साहित्य

मन बावरा,मन चंचल – उमेश नागभागम भाग करें;

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मन बावरा,मन चंचल – उमेश नागभागम भाग करें;
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कहता है कुछ करता है कुछ
और रमता कहीं ओर है।
 न चाहूं मैं सोना चांदी,
  न चाहूं मैं ध्यान समाधि।
   मैं तो हूं सामाजिक प्राणी,
    त्रिगुण है भाव मेरा।
    सद्-चित-आंनद में ही
     रमे मन मेरा,
      यही ध्येय है मेरा।
       मोह-मद-लोभ के-
       चाल से,
       सदा दूर रहें मन मेरा।
       हैं चाहत कि संकलन –
       वृत्ति से दूर रहूं,
       उदारता और विकलन-
       में ही रहे मन मेरा।
       असत् से सत की ओर
       गतिमान हो,
       समदृष्टा,ज्ञेय और ज्ञाता
       हो मेरा।
       न कोई प्रतिद्वंद्वी हो-
       न कोई बेरी,
       समदृष्टा व स्नेहशील हो
       यें बावरा – चंचल मन
        मेरा।
                  श्रीमती उमेश नाग जयपुर राजस्थान

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