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फ़रेब का महीना – रशीद अकेला

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   फ़रेबी मुहब्बत के फ़रेबी तक़रार में
नंगी हो रही लड़कियाँ दो दिन के प्यार में
कौन समझाये ? शर्म-ओ-हया नारियों का गहना है !
मुहब्बत नहीं ये फ़रेब का महीना है ।।1।।
   इज़्ज़त होगी सड़कों पे नीलाम
 उतरेंगे जिस्म से कपड़े यूं सरेआम
हमारी सभ्यता संस्कृति अद्वितीय अनमोल सबका कहना है
मुहब्बत नहीं ये फ़रेब का महीना है ।।2।।
    क्या हालत हो गई है ? संसार में
हवसी भेड़िए घात लगाये हैं शिकार में
बेटी बचाओ अब तो हुक्मरानों का भी कहना है …
मुहब्बत नहीं ये फ़रेब का महीना है ।।3।।
       मुहब्बत के नाम पे धोखा
     सुरक्षा के नाम पे  धोखा
काला दिन ..काली करतूतों का आईना है
मुहब्बत नहीं ये फ़रेब का महीना है ।।4।।
बचा लो अपनी इज्जत-व-आबरू
बचा लो देश की इज्जत-व-आबरू
पाश्चात्य संस्कृति का स्वरूप बड़ा घिनौना है
मुहब्बत नहीं ये फ़रेब का महीना है ।।5।।
रशीद अकेला , झारखण्ड
लेखक एवं समाजसेवी

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