
गुरु – कमल धमीजा
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अगर गुरु ना होते
तो ना जाने हम
किस गर्त में होते
ना होती किताबें,
ना इस हाल में होते
पड़े होते कहीं अंधेरों में
इक रोशनी की तलाश में
गुरु वो रस्सी है
जो खैंच लाता है
गहरे कुॅंए से डूबते
हुए इंसान को ,
और दिखा देता है
सूरज की रशिमों को
गुरु वो आंवले का पेड़ है
जिसकी मिठास
खाने के बाद
याद आती है और,
जिंदगी संवर जाती है
स्वरचित मौलिक अधिकार रचना
कमल धमीजा
फरीदाबाद- हरियाणा
